Thursday, 28 July 2011

बच्चो को दिखाई सही दिशा

मैं तब दिल्ली सरकार में अधिकारी के पद पर कार्यरत था। हर महीने के आखिर में पैसों की तंगी होना आम बात थी। ऐसे में अगर कोई खर्च सिर पर आ जाए, तो बिना उधार के काम नहीं चलता था। एक बार महीने की 24 तारीख को मेरा बेटा सौरभ अपना टूटा हुआ जूता लेकर मेरे पास आया। वह सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था। बेटे ने कहा, ‘पापा, मेरा जूता बनवा दीजिए, वरना कल से स्कूल नहीं जा पाऊंगा।’ मैं परेशान हो गया क्योंकि जो भी पैसे थे, सारे खर्च होने थे। मैं सोचने लगा कि अब क्या करूं, किस मद के पैसे से जूता बनवाऊं। आखिर सब्जी आनी भी जरूरी थी औैर बस का किराया देना भी। ऐसे में किसी से उधार मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था। मैंने अपनी पत्नी से सारी बात बताई, तो वह भी चिंतित हो गई। तभी मेरा बेटा आया और हम दोनों को चिंतामग्न देखकर बोल पड़ा, ‘पापा, क्या हुआ आप परेशान क्यों हैं?’ मैंने बच्चे से झूठ बोलना मुनासिब नहीं समझा और सारी बात उसे बता दी। यह सुनकर सौरभ भी परेशान हो गया। लेकिन अचानक वह मेरे पास आया और बोला, ‘पापा, एक उपाय है, जिससे हमारी समस्या का हल हो सकता है।’ ‘क्या’, मैंने चौंककर पूछा। सौरभ बोला, ‘पापा, मैं अपने एक पैर में पट्टी बांध लेता हूं और चप्पल पहनकर स्कूल चला जाऊंगा। जब सर पूछेंगे, तो कह दूंगा, मोच आ गई है। कुछ दिन इसी तरह आऊंगा। औैर फिर आप भी आवेदन पत्र लिखकर दे देना। और फिर दो-तीन दिनों की तो बात है। जब आपको सैलरी मिल जाएगी, तो जूता भी बन जाएगा।’ पर मैं इसके लिए राजी नहीं हुआ क्योंकि इससे सौरभ को भी झूठ बोलना पड़ता। इसलिए मैंने उसके शिक्षक से बात की। उन्होंने तुरंत अपनी मंजूरी दे दी। इस तरह सौरभ को भी झूठ नहीं बोलना पड़ा और मुझे भी। पर जब भी यह घटना याद आती है, मेरा दिल भर आता है।

Wednesday, 20 July 2011

आस्था

कुछ लोग आधुनिकता की आड़ में आस्था पर भी चोट करने से बाज नहीं आते। बात पिछले साल की है, जब सावन मास आरंभ होते ही समिति के सदस्य हमारे एक पड़ोसी के पास कांवड़ सेवा शिविर के आयोजन के लिए सहयोग मांगने गए। तब उन्होंने इसे बेकार आयोजन कहते हुए इसकी बहुत आलोचना की। सभी सदस्य खिन्न मन से लौट आए। पर शिविर का आयोजन हुआ।
रात को वह टहलते हुए शिविर में आ गए और व्यंग्य करने लगे। तभी एक कांवड़ियां थकान से चूर लंगड़ाता हुआ शिविर में आ गया। उसके पास खड़ी कांवर थी और सभी सदस्य अन्य कांवड़ियों की सेवा में जुटे थे। इसलिए हमने उन महोदय से उसकी कांवड़ लेकर खड़े रहने का अनुरोध किया। वह भी भाव खाते हुए तुरंत राजी हो गए। शिवभक्त आराम करने लगा। उसे जल्दी ही आंख लग गई। हम सेवा में लगे रहे। करीब डेढ़-दो घंटे के बाद जब उसकी आंख खुली, तो वह उन महोदय को धन्यवाद देता हुआ, चला गया। उसके जाते ही हमारे पड़ोसी फट पड़े, ‘मेरी तो कमर ही टूट गई। कहां फंसा दिया तुम लोगों ने।’ तभी एक सदस्य बोला, ‘आपको अपनी पड़ी है। जरा उस शिवभक्त को देखिए, जो थकान व शरीर की चिंता किए बिना एक भाव से पैदल कांवड़ लेकर हरिद्वार से आया था। उसकी आस्था से तो कुछ सीखिए।’ यह सुनते ही उन्हें सबकुछ समझ आ गया। फिर वह भी हमारे साथ सेवा करने लगे।

Monday, 11 July 2011

आज के विद्रोही

ये विद्रोही राजधानी के विश्वविद्यालय का पढा हुआ है, और अंतर्राष्ट्रीय सचांर व्यवस्था के , सर्वोच्च से संपर्क साधे हुए है । लेकिन विद्रोही के पीछे वुश है , और वुश के पीछे माउस है , लेकिन मुष के पीछे बिल्ली है , न ये वाशिंगटन है, न ये इटली है , ये हिन्दुस्तान है , दिल्ली है, जहां का विद्रोही वासी है, आदिवासी है , विद्रोही , लेकिन ये महानुभाव वनवासी बताते है॥

Wednesday, 6 July 2011

मोतिओ का हार

एक बार कि बात है कृष्ण देव अपने दरबार मे बैठे थे और प्रजा का दुख सुख सुन रहे थे । तभी उनके दरबार मे दो भाई आए । उनमे से छोटा भाई कह रहा था । कि पिता जी के पास एक कीमती हार था परन्तु बडा भाई कह रहा था कि वह नकली था और मेरे से कही खो गया है । इतने मे छोटा भाई बोला कि हार खो जाने का गम नही मुझे और मै कौन उसमे से हिस्सा माँग रहा हुँ ॥ परन्तु मेरे बडे भाई मेरे स्वर्गवासी पिता की प्रतिष्ठा पर जो तोहमत लगा । वह मुझसे बर्दास्त नही होता ।जो पिता अपने नौकरो को सोने के जेवर दान मे दिया करते थे । वह भला क्यो अपने लिए नकली मोतियो का हार क्यो बनवायेगे ।राजा कह रहा था हार सामने होता तो शायद कुछ फैसला हो पाता ।परन्तु बडे भाई के अनुसार हार उससे कही खो गया ।अब झुठ और सच की तथा असली नकली की पहचान कैसे हो सकती थी । राजा कृष्ण देव राय भी बडी उलझन मे फंस गये थे । सोच रहे थे कि क्या फैसला किया जाए । सहायता कि नजर से उन्होने महाचतुर, तेलानीराम की तरफ नजर दौडाई । तेनालीराम ने महाराज का इशारा पाकर उन दोनो से बोले कि सेठ जी जिन डिब्बो मे अपना किमती सामान रखते थे उन डिब्बो को कल तुम यहाँ ले आओ । अगले दिन खाली डिब्बो सहित दोनो भाई दरबार मे उपस्थित हुए तेलानीराम ने डिब्बो को उलट पलट कर देखा फिर उनकी नजर सोने कि सन्दुकची पर टिक गई , तेलानीराम बोले इतनी किमती सन्दुकची तुम्हारे पिता जी क्या करते थे ? छोटा भाई बोला इसमे वह अपनी सबसे प्रिय वस्तु रखते थे ।तेनालीराम ने पुछा क्या सबसे प्रिय बस्तु क्या मोतिओ का हार था ।तेनालीराम ने महराज से कहा भला आप यह सोचिए जो बस्तु जो बस्तु इतनी कीमती सन्दुकची मे रक्खी जाती थी वह भला नकली कैसे हो सकती है ।तभी बडे भाई ने महराज से झमा मागी । और आधा हिस्सा छोटे भाई को देने का वादा करके वापस चले गये ।तेनालीराम की सुझ बूझ और अक्लंमदी की सारे दरवारी वाह -2 करने लगे 
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 किसी ने सच ही कहा है सच्चाई का हो बोल बाला झुठे का हो मुह काला
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Monday, 4 July 2011

पैसे बचाए जिंदगी खुशाल बनाये

मेरे शहर की ही है। एक मजदूर अपने ार से करीब पांच किलोमीटर दूर एक कारखाने मे प्रतिदिन पैदल आता था। कारखाने से शाम को छुट्टी होने पर रास्ते मे एक दुकान से रोज मूंगफली खरीदकर खाते हुए ार पहुंचता था। इस दौरान दुकानदार से उसकी जान-पहचान बढ़ गई। एक दिन दुकानदार ने उससे पूछा, ‘आप कहां काम करते है? आपके कितने बो है?’ मजदूर ने बताया, ‘यहां से थोड़ी दूर जो लोहे का कारखाना है, मै उसी मे काम करता हूं। ार पर पनी और चार बो है, जिनकी सारी जिम्मेदारी मुझ पर ही है।’ दुकानदार ने पूछा, ‘कुछ पैसे बचा लेते हो या सारे खर्च हो जाते है?’ इस सवाल पर मजदूर थोड़ा मुस्कराते हुए बोला, ‘अरे साहब, बचाना तो दूर की बात है, बड़ी मुश्किल से दो रोटी नसीब हो पाती है।’ दुकानदार जब मूंगफली तौलकर मजदूर को देता, तब उसमे से एक मूंगफली निकालकर अलग पैकेट मे रखता जाता था। इस बात से मजदूर अनजान होता था।
एक दिन जब मूंगफली का पैकेट भर गया, तो दुकानदार ने उसकी खरीदी हुई मूंगफली खरीदकर वह भरा हुआ पैकेट भी उसे दे दिया। फिर बोला, ‘यह भी आपकी ही मूंगफली है।’ मजदूर ने हैरान होते हुए कहा, ‘मैने इतनी यादा मूंगफली खरीदी ही नही है। फिर यह मेरी कैसे हो सकती है?’ दुकानदार हंस पड़ा और बोला, ‘असल मे मै जब रोज आपकी मूंगफली तौलता था, तो हर दिन एक मूंगफली निकाल लेता था। इसी से यह पैकेट भर गया।’ फिर वह मजदूर को समझाते हुए बोला, ‘इसी तरह अगर आप अपनी कमाई मे से रोज कुछ निकालकर रखेगे, तो एक दिन आपके बचत की थैली भी भर जाएगी।’ अब मजदूर की आंखे खुल गईं और उसने बचत के इस गुर को सीख लिया। 
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किसी ने सच ही कहा है बूंद -२ से घड़ा भरता  है  
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दुसरो के जीना

                                  जी तो लेते हो ,खुद के लिए 
                              जी कर देखा कभी दुसरो के लिए 


                               अपनी ख्वाहिशो को करते हुए पूरी 
                                     जिंदगी निकल जाती है 
                      ख्वाहिशे नहीं हो पाती पूरी मौत आ जाती है 

                               कभी देखा है हंस के जोड़े को 
                              जीते है वोह एक दुसरो के लिए 
                           कुछ तो सीखो उन पंछी के जोड़ो से 
                                जो जीते हो खुद के लिए 
                               एक बार जी लो दुसरो के लिए 
                                    जिंदगी बदल जाएगी 
                         आत्मा की नजर में बन जाओगे हीरो 
                             जिंदगी खुद में खुद सुधर जाएगी 
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यहाँ पर शायद बहुत सी गलतिया नजर आये पर शब्दों  पर न जाकर भावनाओ को समछे 
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लेखक -- दीपक कुमार < दिल की  जुबान >
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Sunday, 3 July 2011

मतलबी इंसान जिसकी सहयता भी नहीं करते भगवान्

एक बार शंकर जी और पार्वती माता स्वर्गलोक की सैर पर निकले। पार्वती जी ने दूर एक आदमी को भूख से तड़पते हुएदेखा। उसे तड़पते हुएदेखकर भी शंकर भगवान आगे बढ़ गए। पार्वती जी से रहा न गया। उन्होंने इस पर प्रश्न किया कि आखिर क्यों शंकर भगवान ने उस आदमी के प्रति दया न दिखाईं। जबकि उन्हें तो करुणा का सागर कहा जाता है।
शंकर भगवान बोले, ‘तुम जानती नहीं हो, देवि। मनुष्य की आदत है अपने मन के बहकावे में आ जाना। इस आदमी की सहायता हेतु मैंने कई बार परीक्षा ली, हर बार यह उस परीक्षा में असफल साबित हुआ। कभी अपने मन के कारण, तो कभी अपने कर्मों के कारण।’ पार्वती जी को विश्वास न हुआ, इसलिएउन्होंने शंकर भगवान से उस आदमी की सहायता करने का निवेदन एक बार फिर किया।
शंकर भगवान ने उस आदमी की एक बार फिर परीक्षा ली। उन्होंने उस आदमी को अचानक खूब सारे खाने और अनाज से घेर दिया। वह आदमी इतना खाना देखकर प्रसन्न हो गया और तुरंत अपनी पेट की भूख शांत कर ली। कुछ ही क्षणों में भगवान शंकर वहां भूखे के रूप में पहुंचे और खाना मांगा। पर उस व्यक्ति ने अपने भविष्य की सुरक्षा के कारण उनकी मदद न की और देखते ही देखते उसका सारा अनाज गायब हो गया। शंकर भगवान पार्वती जी से बोले, ‘देवि, जिसे पता हो कि भूख क्या होती है, वह असमर्थकी सहायता न करे, उसकी सहायता क्या करना। दूसरों के प्रति करुणा तो इनसानी धर्महै। पर यह व्यक्ति उसे भी नहीं निभा पा रहा है।’ यह देखकर पार्वती जी चुप हो गईं और शंकर जी के साथ आगे चल दीं।
द्मद्मद
...और देवी पार्वती चुप हो गईं
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कविता

                           जिंदगी में हैं अनेक रंग
                         जी लो इसे हर किसी के संग
                          पर खुशियां हैं मुझसे रुठी
                           हंसती हूं मैं, पर झूठी-मूठी
                      जाने किसकी लगी है मुझे नजर
                          सभी तो हैं इससे बेखबर
                         हर वक्त रहती हूं मैं बेचैन
                       एक पल न आए मुझको चैन
                           जल्दी से कट जाए
                           जिंदगी का ये सफर
                          अब नहीं होता मुझसे
                            यह कठिन सफर
                         लगती है यह दुनिया एक
                               भ्रमर जाल
                       हर दिन चलता है कोई नई
                                     चाल
                         मैं भी फंस गई भंवर में
                        कुछ न आए समझ में
                     कहां गए वो जिंदगी के रंग...।
                             जिंदगी के रंग
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                  लेखक ------ शालिनी यादव
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मेहनत का फल मीठा होता है

यह कहानी प्राचीन काल की!!!  एक राजा था वोह घुमने जा रहा था ! राजा ने रास्ते में एक पत्थर रक्खा  देखा ! वोह इन्तजार करने लगा की कोई आकर इस पत्थर को यहाँ से हटाये ! तभी राजा के कुछ साथी वहा आ गये ! उन्होंने पत्थर हटाने की वजाए राजा  को ही उस पत्थर को वहा होने का जिम्मेदार ठहराया  , परन्तु किसी ने पत्थर को वहा से हटाने की कोसिस नहीं की ! कुछ समय बाद वहा से एक किसान गुजरा वोह अपने सर पर सब्जियों का बोछ  रखके हुआ था ! उसने वहा पर एक बड़ा पत्थर रखा  देखा !उस किसान ने सब्जियों को निचे रख कर उस पत्थर हटाने लगा कुछ समय पश्चात वोह वह पत्थर हटाने में कामयाब हो गया !और फिर वह सब्जियों को सर में रखकर चलने लगा ! जब वोह सब्जियों को सर में रखने लगा उसने देखा की जहा पर पत्थर रख्का था वहा एक थैला  पड़ा है उसने सब्जियों को निचे रखकर उस थैले  को उठाया उस थैले  में सोने की असरफिया थी उसने वोह थैला  राजा के पास जाकर उन्हें देने लगा लेकिन राजा ने वह थैला  लेने वजाय उस किसान को दे दिया और कहा यह तुम्हारी  मेहनत का फल है ! वहा मोजूद राजा के व्यापारी दोस्त उस थैले  को ललचाई नजरो से देख  रहे  थे ! उस थैले  को किसान को सुपुद्र  करके राजा ने कहा की तुमने इस रास्ते को साफ़ किया है और यहाँ से गुजरने वालो को जाने की सुबिथा की है इसलिए यह सारी असरफिया उस किसान की मेहनत का फल है और राजा वहा से चले गए ! किसान वोह असरफिया लेकर  खुशी - २ वहा से चला  गया! इसी लिए कहते है मेहनत का फल मीठा होता है ?"
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-------------किसी ने सच कहा है मेहनत का फल मीठा होता है -----------------
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-------------मेहनत के लिए किसी ने  यही कहावत कही  हुई  की--------------- ------------------------------------------------------------------------------------------                            करत -२ अभ्यास के जड़ मति होत सुजान ,
                         रसरी आवत जात ते सिल पर पडत निसान!!
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Saturday, 2 July 2011

परवरिश में खोट

यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जो बचपन में बहुत होनहार था! लेकिन जब वोह स्कूल में गलत बच्चो की संगत  में पड़ जाता है! और वोह स्कूल के बच्चो की कापी पेन्सिल जैसी छोटी -२ चोरिया शुरू   कर देता है! लेकिन उसकी माँ को यह बात पता चल जाती लेकिन वोह उसे रोकने की वजाय उसे और  प्रोत्सहन देती है ! और उसे अपने लड़के के इस काम से ख़ुशी  होती है वोह इसलिए की उसे पढाई करने  का  सामान  खरीदना नहीं पड़ता था! लेकिन जैसे -२ वह बड़ा होता गया ! और काम भी उसके बड़े होते गए धीरे -२  वोह बड़ी चोरिया , मर्डर जैसे काम  करना शुरु कर दिया उसने .,एक दिन ऐसा आया की वोह मशहुर हो गया  और पुलिस की मोस्ट वांटेड लिस्ट में सुमार हो गया ! उसकी माँ उसके इस काम से बड़ी खुश  रहती थी ! क्योकि उसकी माँ को सानो सौकत की जिन्दगी जीने को मिल रही थी ! एक दिन ऐसा आया की वोह जेल की सलाखों के पीछे पहुच गया और उसे जज के सामने पेस किया गया ! उसे जज ने एक कठोर  सजा सुनाई , जो की फ़ासी  थी , उसे अब भूल का अहेसास हुआ! लेकिन अब क्या हो सकता था !उसकी आखिरी इच्छा पूछी गई ! उसने आखिरी इच्छा में अपनी  माँ से मिलने की ख्वाहिस जाहिर की ,उसकी माँ को बुलाया गया ,उसकी माँ उसे जेल में देख बहुत दुखी हुई ,तो उसके लड़के ने जवाब दिया ,अगर मुछे बचपन में , जब मै , पहली बार स्कूल  में  चोरी की थी , ! तब अगर मुछे उसी दिन एक तमाचा    खीच कर मर दिया होता तो मै आज यहाँ नहीं हो ! और तुछे यह दिन देखना नहीं पड़ता , उसकी माँ को बहुत पछतावा हुआ लेकिन "------------- यही कहावत हुई की    -------------"
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         !------------अब पछताए होत का ,जब चिड़िया चुग गई खेत -----------!
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Friday, 1 July 2011

बैरागी राजा और लालची ब्रह्ममण





एक राजा था जो रोज सुबह उठ कर घुमने निकलता था , तो उसे दरवाजे पर सुबह पहला जो भी याचक  मिलता था उसे वोह मुँह मागा दान देता था एक दिन जैसे ही राजा अपने दरवाजे के पास आया उसे एक ब्रह्मण याचक दिखाई खड़ा  दिया राजा ने रुक कर ब्रह्ममण से पूछा बताइए आपको क्या चाहिए  ? ब्रह्मण ने संकोच वस् जो भी आप देगे मुछे स्वीकार होगा ? इस पर राजा ने आग्रह किया की आप खुद बताये की आप को क्या चाहिए ! अतः ब्रह्ममण सोच में पड़ गया की वोह क्या मागे धीरे धीरे उसके अन्दर लालच का बिज उगने लगा और ब्रह्ममण ने कहा की मुछे कुछ समय चाहिए  बताने के लिए , इस पर राजा ने कहा ठीक है ! और राजा ने उसे समय दे दिया और राजा घुमने  चले गए ! अब ब्रह्ममण के मन में विचार आया की, मै एक याचक और वोह एक राजा क्यों न सारा राज-पाट माग लिया जाये जिससे फिर किसी से कुछ मागने की जरूरत नहीं पड़ेगी और लोग मेरे सामने याचक होगे राजा के वापस आकर पूछने पर उसने छट से कहा वह राज्य चाहता है!! राजा ने कहा प्रिय वर  अपने मुछे तो भारहीन कर दिया आप नहीं जानते की मै कितने दिनों से प्रतिच्छा में था की कब इससे मुक्त होऊ ! मै न सो पाता हु  न चैन से खा पाता हु  हर पल मुछे मेरी प्रजा की चिंता रहती है , हर पल मै अपने देश के शत्रुओ के बारे में सोचता  रहता हु न तो मुछे भगवान् भजन का समय मिलता है न उसके द्वारा बनाये इस संसार को देखने का , यह सब सुनकर ब्रह्मण की आखे खुल गई उसे राजा की महानता का अनुभव हुआ और स्वयं पर पछतावा एक राजा हो कर भी राजा को अपने राज्य पर कोई मोह नहीं था लेकिन वोह ब्रह्मण होते हुए भी मोह में फस गया जब राजा ने सारा राज्य ब्रह्मण को देने के लिए मंत्रियो से राज्य देने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पीछे मुड़े तब तक ब्रह्ममण जा चूका था ????