Wednesday, 20 July 2011

आस्था

कुछ लोग आधुनिकता की आड़ में आस्था पर भी चोट करने से बाज नहीं आते। बात पिछले साल की है, जब सावन मास आरंभ होते ही समिति के सदस्य हमारे एक पड़ोसी के पास कांवड़ सेवा शिविर के आयोजन के लिए सहयोग मांगने गए। तब उन्होंने इसे बेकार आयोजन कहते हुए इसकी बहुत आलोचना की। सभी सदस्य खिन्न मन से लौट आए। पर शिविर का आयोजन हुआ।
रात को वह टहलते हुए शिविर में आ गए और व्यंग्य करने लगे। तभी एक कांवड़ियां थकान से चूर लंगड़ाता हुआ शिविर में आ गया। उसके पास खड़ी कांवर थी और सभी सदस्य अन्य कांवड़ियों की सेवा में जुटे थे। इसलिए हमने उन महोदय से उसकी कांवड़ लेकर खड़े रहने का अनुरोध किया। वह भी भाव खाते हुए तुरंत राजी हो गए। शिवभक्त आराम करने लगा। उसे जल्दी ही आंख लग गई। हम सेवा में लगे रहे। करीब डेढ़-दो घंटे के बाद जब उसकी आंख खुली, तो वह उन महोदय को धन्यवाद देता हुआ, चला गया। उसके जाते ही हमारे पड़ोसी फट पड़े, ‘मेरी तो कमर ही टूट गई। कहां फंसा दिया तुम लोगों ने।’ तभी एक सदस्य बोला, ‘आपको अपनी पड़ी है। जरा उस शिवभक्त को देखिए, जो थकान व शरीर की चिंता किए बिना एक भाव से पैदल कांवड़ लेकर हरिद्वार से आया था। उसकी आस्था से तो कुछ सीखिए।’ यह सुनते ही उन्हें सबकुछ समझ आ गया। फिर वह भी हमारे साथ सेवा करने लगे।

1 comment:

  1. बहुत सही कहा है आपने दीपक जी आभार

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