Wednesday, 10 August 2011

मेहनत का फल मीठा होता है

  मैं अपना भविष्य अच्छा बनाने के लिए पढ़ाई में लगातार मन लगाता था और मेरे दो खास दोस्त भी पढ़ाई में काफी अच्छे थे। एक दिन हम तीनों ने मिलकर घूमने की योजना बनाई। हमने सोचा कि पेपर होने में काफी समय बचा हुआ है। तभी मैंने कहा, ‘अरे यार, पेपर होना बाकी है और हम घूमने जाएंगे।’ लेकिन मेरे दोस्तों ने एक न मानी औैर हम तीनों सैर पर निकल पड़े। सैर करते-करते हमारा मन भर गया, तो हमें उसी रोड पर आते हुए सर पर नजर पड़ी, जो हमें रसायन विज्ञान पढ़ाते थे। हमने सोचा कि हम रास्ता बदल लेते हैं, तभी उनकी नजर हम पर पड़ गई। वह हमें देखते ही हमारे पास आ गए। उन्होंने हमसे हालचाल पूछा और कहा, ‘अरे तुम लोग घूम रहे हो। तुम्हारी परीक्षा निकट है।’ जवाब देने के बदले हम तीनों बगलें झांकने लगे। हमसे कुछ भी बताया न गया। सर भी हमारी विवशता को समझ गए और फिर बोले, ‘देखो, बच्चों, घूमना-फिरना अच्छी बात है, पर पहले पढ़ाई करनी जरूरी है। तुमलोग पहले से मेहनत नहीं करोगे, तो इसका परिणाम खुद देखकर पछताओगे।’ इसके बाद उन्होंने हमें जाने को कहा। हम तीनों दोस्तों ने इस घटना से सीख ली और खूब पढ़ाई की। हम तीनों ने परीक्षा में अच्छे अंक पाए और तब हमने जाना की मेहनत एवं सच्चाई की राह कितनी अच्छी होती है। 
                     अंग्रेजी में मशहूर कहावत है
       STRIKE THE  IRON WHILE  IT IS HOT 
 किसी ने सच ही कहा है अवसर को कभी न गवावो इसी लिए यह कहावत कही गयी है
 

Monday, 8 August 2011

जिसको हो खुद पर विस्वास इश्वर देता है उसका साथ

बात उन दिनों की है, जब मैं मात्र आठ वर्ष का था। मेरा एक दोस्त था, जो मूर्ति बनाने का शौक रखता था। जब भी दुर्गा पूजा में वह मूर्तियों को देखता, तो बोलता ‘मैं भी इसी तरह की मूर्तियां बनाना चाहता हूं।’उसकी बात सुनकर सारे दोस्त मजाक उड़ाते। पर मैं गौर से उसे देखता रहता। शुरू में वह घर वालों से छिपाकर कागज की दफ्ती काटकर उससे मूर्ति बनाता था। जब कोई देख लेता, तो खूब डांट पड़ती। ‘ये लड़का पढ़ाई-लिखाई छोड़कर केवल मूर्तियां बनाता रहता है।’ पर वह अपने सपने को पूरा करने का प्रयास करता रहता। फिर पड़ोस में एक भैया के कहने पर उसने मिट्टी की मूर्तियों पर हाथ आजमाना शुरू कर दिया। पर इससे भी उसके घर वालों को तकलीफ होती थी। दरअसल पूरे घर में मिट्टी फैल जाती थी। उसकी मम्मी भी उसे खूब डांटती थी। धीरे-धीरे उसकी प्रैक्टिस बढ़ती गई और वह अपनी कला में माहिर होता गया। आज उसकी उम्र 18 वर्ष है और बिना किसी सांचे के वह छोटी-छोटी मूर्तियां बना लेता है। आज जब लोग उसकी कारीगरी देखते हैं, तो दंग रह जाते हैं। बिना किसी गुरु के उसने अपनी कला को इतना अधिक निखार लिया है कि अच्छे-अच्छे कलाकारों के समकक्ष आसानी से खड़ा हो सकता है। उसमें अपने स्कूल व कॉलेज में भी कई मूर्तियां बनाकर दी हैं। आज जब भी उससे इतनी अच्छी कारीगरी की वजह पूछी जाती है, तो वह कहता है, ‘हम सभी में एक न एक खास गुण होता है, जिसे निखारने पर जीवन का उद्देश्य भी बन सकता है। मैंने भी यहीं किया और नतीजा सामने है।’ वाकई मेरे दोस्त की यह कहानी पूरे समाज के लिए एक संदेश है।