Wednesday, 10 August 2011

मेहनत का फल मीठा होता है

  मैं अपना भविष्य अच्छा बनाने के लिए पढ़ाई में लगातार मन लगाता था और मेरे दो खास दोस्त भी पढ़ाई में काफी अच्छे थे। एक दिन हम तीनों ने मिलकर घूमने की योजना बनाई। हमने सोचा कि पेपर होने में काफी समय बचा हुआ है। तभी मैंने कहा, ‘अरे यार, पेपर होना बाकी है और हम घूमने जाएंगे।’ लेकिन मेरे दोस्तों ने एक न मानी औैर हम तीनों सैर पर निकल पड़े। सैर करते-करते हमारा मन भर गया, तो हमें उसी रोड पर आते हुए सर पर नजर पड़ी, जो हमें रसायन विज्ञान पढ़ाते थे। हमने सोचा कि हम रास्ता बदल लेते हैं, तभी उनकी नजर हम पर पड़ गई। वह हमें देखते ही हमारे पास आ गए। उन्होंने हमसे हालचाल पूछा और कहा, ‘अरे तुम लोग घूम रहे हो। तुम्हारी परीक्षा निकट है।’ जवाब देने के बदले हम तीनों बगलें झांकने लगे। हमसे कुछ भी बताया न गया। सर भी हमारी विवशता को समझ गए और फिर बोले, ‘देखो, बच्चों, घूमना-फिरना अच्छी बात है, पर पहले पढ़ाई करनी जरूरी है। तुमलोग पहले से मेहनत नहीं करोगे, तो इसका परिणाम खुद देखकर पछताओगे।’ इसके बाद उन्होंने हमें जाने को कहा। हम तीनों दोस्तों ने इस घटना से सीख ली और खूब पढ़ाई की। हम तीनों ने परीक्षा में अच्छे अंक पाए और तब हमने जाना की मेहनत एवं सच्चाई की राह कितनी अच्छी होती है। 
                     अंग्रेजी में मशहूर कहावत है
       STRIKE THE  IRON WHILE  IT IS HOT 
 किसी ने सच ही कहा है अवसर को कभी न गवावो इसी लिए यह कहावत कही गयी है
 

Monday, 8 August 2011

जिसको हो खुद पर विस्वास इश्वर देता है उसका साथ

बात उन दिनों की है, जब मैं मात्र आठ वर्ष का था। मेरा एक दोस्त था, जो मूर्ति बनाने का शौक रखता था। जब भी दुर्गा पूजा में वह मूर्तियों को देखता, तो बोलता ‘मैं भी इसी तरह की मूर्तियां बनाना चाहता हूं।’उसकी बात सुनकर सारे दोस्त मजाक उड़ाते। पर मैं गौर से उसे देखता रहता। शुरू में वह घर वालों से छिपाकर कागज की दफ्ती काटकर उससे मूर्ति बनाता था। जब कोई देख लेता, तो खूब डांट पड़ती। ‘ये लड़का पढ़ाई-लिखाई छोड़कर केवल मूर्तियां बनाता रहता है।’ पर वह अपने सपने को पूरा करने का प्रयास करता रहता। फिर पड़ोस में एक भैया के कहने पर उसने मिट्टी की मूर्तियों पर हाथ आजमाना शुरू कर दिया। पर इससे भी उसके घर वालों को तकलीफ होती थी। दरअसल पूरे घर में मिट्टी फैल जाती थी। उसकी मम्मी भी उसे खूब डांटती थी। धीरे-धीरे उसकी प्रैक्टिस बढ़ती गई और वह अपनी कला में माहिर होता गया। आज उसकी उम्र 18 वर्ष है और बिना किसी सांचे के वह छोटी-छोटी मूर्तियां बना लेता है। आज जब लोग उसकी कारीगरी देखते हैं, तो दंग रह जाते हैं। बिना किसी गुरु के उसने अपनी कला को इतना अधिक निखार लिया है कि अच्छे-अच्छे कलाकारों के समकक्ष आसानी से खड़ा हो सकता है। उसमें अपने स्कूल व कॉलेज में भी कई मूर्तियां बनाकर दी हैं। आज जब भी उससे इतनी अच्छी कारीगरी की वजह पूछी जाती है, तो वह कहता है, ‘हम सभी में एक न एक खास गुण होता है, जिसे निखारने पर जीवन का उद्देश्य भी बन सकता है। मैंने भी यहीं किया और नतीजा सामने है।’ वाकई मेरे दोस्त की यह कहानी पूरे समाज के लिए एक संदेश है।



Thursday, 28 July 2011

बच्चो को दिखाई सही दिशा

मैं तब दिल्ली सरकार में अधिकारी के पद पर कार्यरत था। हर महीने के आखिर में पैसों की तंगी होना आम बात थी। ऐसे में अगर कोई खर्च सिर पर आ जाए, तो बिना उधार के काम नहीं चलता था। एक बार महीने की 24 तारीख को मेरा बेटा सौरभ अपना टूटा हुआ जूता लेकर मेरे पास आया। वह सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था। बेटे ने कहा, ‘पापा, मेरा जूता बनवा दीजिए, वरना कल से स्कूल नहीं जा पाऊंगा।’ मैं परेशान हो गया क्योंकि जो भी पैसे थे, सारे खर्च होने थे। मैं सोचने लगा कि अब क्या करूं, किस मद के पैसे से जूता बनवाऊं। आखिर सब्जी आनी भी जरूरी थी औैर बस का किराया देना भी। ऐसे में किसी से उधार मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था। मैंने अपनी पत्नी से सारी बात बताई, तो वह भी चिंतित हो गई। तभी मेरा बेटा आया और हम दोनों को चिंतामग्न देखकर बोल पड़ा, ‘पापा, क्या हुआ आप परेशान क्यों हैं?’ मैंने बच्चे से झूठ बोलना मुनासिब नहीं समझा और सारी बात उसे बता दी। यह सुनकर सौरभ भी परेशान हो गया। लेकिन अचानक वह मेरे पास आया और बोला, ‘पापा, एक उपाय है, जिससे हमारी समस्या का हल हो सकता है।’ ‘क्या’, मैंने चौंककर पूछा। सौरभ बोला, ‘पापा, मैं अपने एक पैर में पट्टी बांध लेता हूं और चप्पल पहनकर स्कूल चला जाऊंगा। जब सर पूछेंगे, तो कह दूंगा, मोच आ गई है। कुछ दिन इसी तरह आऊंगा। औैर फिर आप भी आवेदन पत्र लिखकर दे देना। और फिर दो-तीन दिनों की तो बात है। जब आपको सैलरी मिल जाएगी, तो जूता भी बन जाएगा।’ पर मैं इसके लिए राजी नहीं हुआ क्योंकि इससे सौरभ को भी झूठ बोलना पड़ता। इसलिए मैंने उसके शिक्षक से बात की। उन्होंने तुरंत अपनी मंजूरी दे दी। इस तरह सौरभ को भी झूठ नहीं बोलना पड़ा और मुझे भी। पर जब भी यह घटना याद आती है, मेरा दिल भर आता है।

Wednesday, 20 July 2011

आस्था

कुछ लोग आधुनिकता की आड़ में आस्था पर भी चोट करने से बाज नहीं आते। बात पिछले साल की है, जब सावन मास आरंभ होते ही समिति के सदस्य हमारे एक पड़ोसी के पास कांवड़ सेवा शिविर के आयोजन के लिए सहयोग मांगने गए। तब उन्होंने इसे बेकार आयोजन कहते हुए इसकी बहुत आलोचना की। सभी सदस्य खिन्न मन से लौट आए। पर शिविर का आयोजन हुआ।
रात को वह टहलते हुए शिविर में आ गए और व्यंग्य करने लगे। तभी एक कांवड़ियां थकान से चूर लंगड़ाता हुआ शिविर में आ गया। उसके पास खड़ी कांवर थी और सभी सदस्य अन्य कांवड़ियों की सेवा में जुटे थे। इसलिए हमने उन महोदय से उसकी कांवड़ लेकर खड़े रहने का अनुरोध किया। वह भी भाव खाते हुए तुरंत राजी हो गए। शिवभक्त आराम करने लगा। उसे जल्दी ही आंख लग गई। हम सेवा में लगे रहे। करीब डेढ़-दो घंटे के बाद जब उसकी आंख खुली, तो वह उन महोदय को धन्यवाद देता हुआ, चला गया। उसके जाते ही हमारे पड़ोसी फट पड़े, ‘मेरी तो कमर ही टूट गई। कहां फंसा दिया तुम लोगों ने।’ तभी एक सदस्य बोला, ‘आपको अपनी पड़ी है। जरा उस शिवभक्त को देखिए, जो थकान व शरीर की चिंता किए बिना एक भाव से पैदल कांवड़ लेकर हरिद्वार से आया था। उसकी आस्था से तो कुछ सीखिए।’ यह सुनते ही उन्हें सबकुछ समझ आ गया। फिर वह भी हमारे साथ सेवा करने लगे।

Monday, 11 July 2011

आज के विद्रोही

ये विद्रोही राजधानी के विश्वविद्यालय का पढा हुआ है, और अंतर्राष्ट्रीय सचांर व्यवस्था के , सर्वोच्च से संपर्क साधे हुए है । लेकिन विद्रोही के पीछे वुश है , और वुश के पीछे माउस है , लेकिन मुष के पीछे बिल्ली है , न ये वाशिंगटन है, न ये इटली है , ये हिन्दुस्तान है , दिल्ली है, जहां का विद्रोही वासी है, आदिवासी है , विद्रोही , लेकिन ये महानुभाव वनवासी बताते है॥

Wednesday, 6 July 2011

मोतिओ का हार

एक बार कि बात है कृष्ण देव अपने दरबार मे बैठे थे और प्रजा का दुख सुख सुन रहे थे । तभी उनके दरबार मे दो भाई आए । उनमे से छोटा भाई कह रहा था । कि पिता जी के पास एक कीमती हार था परन्तु बडा भाई कह रहा था कि वह नकली था और मेरे से कही खो गया है । इतने मे छोटा भाई बोला कि हार खो जाने का गम नही मुझे और मै कौन उसमे से हिस्सा माँग रहा हुँ ॥ परन्तु मेरे बडे भाई मेरे स्वर्गवासी पिता की प्रतिष्ठा पर जो तोहमत लगा । वह मुझसे बर्दास्त नही होता ।जो पिता अपने नौकरो को सोने के जेवर दान मे दिया करते थे । वह भला क्यो अपने लिए नकली मोतियो का हार क्यो बनवायेगे ।राजा कह रहा था हार सामने होता तो शायद कुछ फैसला हो पाता ।परन्तु बडे भाई के अनुसार हार उससे कही खो गया ।अब झुठ और सच की तथा असली नकली की पहचान कैसे हो सकती थी । राजा कृष्ण देव राय भी बडी उलझन मे फंस गये थे । सोच रहे थे कि क्या फैसला किया जाए । सहायता कि नजर से उन्होने महाचतुर, तेलानीराम की तरफ नजर दौडाई । तेनालीराम ने महाराज का इशारा पाकर उन दोनो से बोले कि सेठ जी जिन डिब्बो मे अपना किमती सामान रखते थे उन डिब्बो को कल तुम यहाँ ले आओ । अगले दिन खाली डिब्बो सहित दोनो भाई दरबार मे उपस्थित हुए तेलानीराम ने डिब्बो को उलट पलट कर देखा फिर उनकी नजर सोने कि सन्दुकची पर टिक गई , तेलानीराम बोले इतनी किमती सन्दुकची तुम्हारे पिता जी क्या करते थे ? छोटा भाई बोला इसमे वह अपनी सबसे प्रिय वस्तु रखते थे ।तेनालीराम ने पुछा क्या सबसे प्रिय बस्तु क्या मोतिओ का हार था ।तेनालीराम ने महराज से कहा भला आप यह सोचिए जो बस्तु जो बस्तु इतनी कीमती सन्दुकची मे रक्खी जाती थी वह भला नकली कैसे हो सकती है ।तभी बडे भाई ने महराज से झमा मागी । और आधा हिस्सा छोटे भाई को देने का वादा करके वापस चले गये ।तेनालीराम की सुझ बूझ और अक्लंमदी की सारे दरवारी वाह -2 करने लगे 
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 किसी ने सच ही कहा है सच्चाई का हो बोल बाला झुठे का हो मुह काला
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Monday, 4 July 2011

पैसे बचाए जिंदगी खुशाल बनाये

मेरे शहर की ही है। एक मजदूर अपने ार से करीब पांच किलोमीटर दूर एक कारखाने मे प्रतिदिन पैदल आता था। कारखाने से शाम को छुट्टी होने पर रास्ते मे एक दुकान से रोज मूंगफली खरीदकर खाते हुए ार पहुंचता था। इस दौरान दुकानदार से उसकी जान-पहचान बढ़ गई। एक दिन दुकानदार ने उससे पूछा, ‘आप कहां काम करते है? आपके कितने बो है?’ मजदूर ने बताया, ‘यहां से थोड़ी दूर जो लोहे का कारखाना है, मै उसी मे काम करता हूं। ार पर पनी और चार बो है, जिनकी सारी जिम्मेदारी मुझ पर ही है।’ दुकानदार ने पूछा, ‘कुछ पैसे बचा लेते हो या सारे खर्च हो जाते है?’ इस सवाल पर मजदूर थोड़ा मुस्कराते हुए बोला, ‘अरे साहब, बचाना तो दूर की बात है, बड़ी मुश्किल से दो रोटी नसीब हो पाती है।’ दुकानदार जब मूंगफली तौलकर मजदूर को देता, तब उसमे से एक मूंगफली निकालकर अलग पैकेट मे रखता जाता था। इस बात से मजदूर अनजान होता था।
एक दिन जब मूंगफली का पैकेट भर गया, तो दुकानदार ने उसकी खरीदी हुई मूंगफली खरीदकर वह भरा हुआ पैकेट भी उसे दे दिया। फिर बोला, ‘यह भी आपकी ही मूंगफली है।’ मजदूर ने हैरान होते हुए कहा, ‘मैने इतनी यादा मूंगफली खरीदी ही नही है। फिर यह मेरी कैसे हो सकती है?’ दुकानदार हंस पड़ा और बोला, ‘असल मे मै जब रोज आपकी मूंगफली तौलता था, तो हर दिन एक मूंगफली निकाल लेता था। इसी से यह पैकेट भर गया।’ फिर वह मजदूर को समझाते हुए बोला, ‘इसी तरह अगर आप अपनी कमाई मे से रोज कुछ निकालकर रखेगे, तो एक दिन आपके बचत की थैली भी भर जाएगी।’ अब मजदूर की आंखे खुल गईं और उसने बचत के इस गुर को सीख लिया। 
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किसी ने सच ही कहा है बूंद -२ से घड़ा भरता  है  
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दुसरो के जीना

                                  जी तो लेते हो ,खुद के लिए 
                              जी कर देखा कभी दुसरो के लिए 


                               अपनी ख्वाहिशो को करते हुए पूरी 
                                     जिंदगी निकल जाती है 
                      ख्वाहिशे नहीं हो पाती पूरी मौत आ जाती है 

                               कभी देखा है हंस के जोड़े को 
                              जीते है वोह एक दुसरो के लिए 
                           कुछ तो सीखो उन पंछी के जोड़ो से 
                                जो जीते हो खुद के लिए 
                               एक बार जी लो दुसरो के लिए 
                                    जिंदगी बदल जाएगी 
                         आत्मा की नजर में बन जाओगे हीरो 
                             जिंदगी खुद में खुद सुधर जाएगी 
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यहाँ पर शायद बहुत सी गलतिया नजर आये पर शब्दों  पर न जाकर भावनाओ को समछे 
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लेखक -- दीपक कुमार < दिल की  जुबान >
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Sunday, 3 July 2011

मतलबी इंसान जिसकी सहयता भी नहीं करते भगवान्

एक बार शंकर जी और पार्वती माता स्वर्गलोक की सैर पर निकले। पार्वती जी ने दूर एक आदमी को भूख से तड़पते हुएदेखा। उसे तड़पते हुएदेखकर भी शंकर भगवान आगे बढ़ गए। पार्वती जी से रहा न गया। उन्होंने इस पर प्रश्न किया कि आखिर क्यों शंकर भगवान ने उस आदमी के प्रति दया न दिखाईं। जबकि उन्हें तो करुणा का सागर कहा जाता है।
शंकर भगवान बोले, ‘तुम जानती नहीं हो, देवि। मनुष्य की आदत है अपने मन के बहकावे में आ जाना। इस आदमी की सहायता हेतु मैंने कई बार परीक्षा ली, हर बार यह उस परीक्षा में असफल साबित हुआ। कभी अपने मन के कारण, तो कभी अपने कर्मों के कारण।’ पार्वती जी को विश्वास न हुआ, इसलिएउन्होंने शंकर भगवान से उस आदमी की सहायता करने का निवेदन एक बार फिर किया।
शंकर भगवान ने उस आदमी की एक बार फिर परीक्षा ली। उन्होंने उस आदमी को अचानक खूब सारे खाने और अनाज से घेर दिया। वह आदमी इतना खाना देखकर प्रसन्न हो गया और तुरंत अपनी पेट की भूख शांत कर ली। कुछ ही क्षणों में भगवान शंकर वहां भूखे के रूप में पहुंचे और खाना मांगा। पर उस व्यक्ति ने अपने भविष्य की सुरक्षा के कारण उनकी मदद न की और देखते ही देखते उसका सारा अनाज गायब हो गया। शंकर भगवान पार्वती जी से बोले, ‘देवि, जिसे पता हो कि भूख क्या होती है, वह असमर्थकी सहायता न करे, उसकी सहायता क्या करना। दूसरों के प्रति करुणा तो इनसानी धर्महै। पर यह व्यक्ति उसे भी नहीं निभा पा रहा है।’ यह देखकर पार्वती जी चुप हो गईं और शंकर जी के साथ आगे चल दीं।
द्मद्मद
...और देवी पार्वती चुप हो गईं
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कविता

                           जिंदगी में हैं अनेक रंग
                         जी लो इसे हर किसी के संग
                          पर खुशियां हैं मुझसे रुठी
                           हंसती हूं मैं, पर झूठी-मूठी
                      जाने किसकी लगी है मुझे नजर
                          सभी तो हैं इससे बेखबर
                         हर वक्त रहती हूं मैं बेचैन
                       एक पल न आए मुझको चैन
                           जल्दी से कट जाए
                           जिंदगी का ये सफर
                          अब नहीं होता मुझसे
                            यह कठिन सफर
                         लगती है यह दुनिया एक
                               भ्रमर जाल
                       हर दिन चलता है कोई नई
                                     चाल
                         मैं भी फंस गई भंवर में
                        कुछ न आए समझ में
                     कहां गए वो जिंदगी के रंग...।
                             जिंदगी के रंग
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                  लेखक ------ शालिनी यादव
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मेहनत का फल मीठा होता है

यह कहानी प्राचीन काल की!!!  एक राजा था वोह घुमने जा रहा था ! राजा ने रास्ते में एक पत्थर रक्खा  देखा ! वोह इन्तजार करने लगा की कोई आकर इस पत्थर को यहाँ से हटाये ! तभी राजा के कुछ साथी वहा आ गये ! उन्होंने पत्थर हटाने की वजाए राजा  को ही उस पत्थर को वहा होने का जिम्मेदार ठहराया  , परन्तु किसी ने पत्थर को वहा से हटाने की कोसिस नहीं की ! कुछ समय बाद वहा से एक किसान गुजरा वोह अपने सर पर सब्जियों का बोछ  रखके हुआ था ! उसने वहा पर एक बड़ा पत्थर रखा  देखा !उस किसान ने सब्जियों को निचे रख कर उस पत्थर हटाने लगा कुछ समय पश्चात वोह वह पत्थर हटाने में कामयाब हो गया !और फिर वह सब्जियों को सर में रखकर चलने लगा ! जब वोह सब्जियों को सर में रखने लगा उसने देखा की जहा पर पत्थर रख्का था वहा एक थैला  पड़ा है उसने सब्जियों को निचे रखकर उस थैले  को उठाया उस थैले  में सोने की असरफिया थी उसने वोह थैला  राजा के पास जाकर उन्हें देने लगा लेकिन राजा ने वह थैला  लेने वजाय उस किसान को दे दिया और कहा यह तुम्हारी  मेहनत का फल है ! वहा मोजूद राजा के व्यापारी दोस्त उस थैले  को ललचाई नजरो से देख  रहे  थे ! उस थैले  को किसान को सुपुद्र  करके राजा ने कहा की तुमने इस रास्ते को साफ़ किया है और यहाँ से गुजरने वालो को जाने की सुबिथा की है इसलिए यह सारी असरफिया उस किसान की मेहनत का फल है और राजा वहा से चले गए ! किसान वोह असरफिया लेकर  खुशी - २ वहा से चला  गया! इसी लिए कहते है मेहनत का फल मीठा होता है ?"
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-------------किसी ने सच कहा है मेहनत का फल मीठा होता है -----------------
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-------------मेहनत के लिए किसी ने  यही कहावत कही  हुई  की--------------- ------------------------------------------------------------------------------------------                            करत -२ अभ्यास के जड़ मति होत सुजान ,
                         रसरी आवत जात ते सिल पर पडत निसान!!
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Saturday, 2 July 2011

परवरिश में खोट

यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जो बचपन में बहुत होनहार था! लेकिन जब वोह स्कूल में गलत बच्चो की संगत  में पड़ जाता है! और वोह स्कूल के बच्चो की कापी पेन्सिल जैसी छोटी -२ चोरिया शुरू   कर देता है! लेकिन उसकी माँ को यह बात पता चल जाती लेकिन वोह उसे रोकने की वजाय उसे और  प्रोत्सहन देती है ! और उसे अपने लड़के के इस काम से ख़ुशी  होती है वोह इसलिए की उसे पढाई करने  का  सामान  खरीदना नहीं पड़ता था! लेकिन जैसे -२ वह बड़ा होता गया ! और काम भी उसके बड़े होते गए धीरे -२  वोह बड़ी चोरिया , मर्डर जैसे काम  करना शुरु कर दिया उसने .,एक दिन ऐसा आया की वोह मशहुर हो गया  और पुलिस की मोस्ट वांटेड लिस्ट में सुमार हो गया ! उसकी माँ उसके इस काम से बड़ी खुश  रहती थी ! क्योकि उसकी माँ को सानो सौकत की जिन्दगी जीने को मिल रही थी ! एक दिन ऐसा आया की वोह जेल की सलाखों के पीछे पहुच गया और उसे जज के सामने पेस किया गया ! उसे जज ने एक कठोर  सजा सुनाई , जो की फ़ासी  थी , उसे अब भूल का अहेसास हुआ! लेकिन अब क्या हो सकता था !उसकी आखिरी इच्छा पूछी गई ! उसने आखिरी इच्छा में अपनी  माँ से मिलने की ख्वाहिस जाहिर की ,उसकी माँ को बुलाया गया ,उसकी माँ उसे जेल में देख बहुत दुखी हुई ,तो उसके लड़के ने जवाब दिया ,अगर मुछे बचपन में , जब मै , पहली बार स्कूल  में  चोरी की थी , ! तब अगर मुछे उसी दिन एक तमाचा    खीच कर मर दिया होता तो मै आज यहाँ नहीं हो ! और तुछे यह दिन देखना नहीं पड़ता , उसकी माँ को बहुत पछतावा हुआ लेकिन "------------- यही कहावत हुई की    -------------"
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         !------------अब पछताए होत का ,जब चिड़िया चुग गई खेत -----------!
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Friday, 1 July 2011

बैरागी राजा और लालची ब्रह्ममण





एक राजा था जो रोज सुबह उठ कर घुमने निकलता था , तो उसे दरवाजे पर सुबह पहला जो भी याचक  मिलता था उसे वोह मुँह मागा दान देता था एक दिन जैसे ही राजा अपने दरवाजे के पास आया उसे एक ब्रह्मण याचक दिखाई खड़ा  दिया राजा ने रुक कर ब्रह्ममण से पूछा बताइए आपको क्या चाहिए  ? ब्रह्मण ने संकोच वस् जो भी आप देगे मुछे स्वीकार होगा ? इस पर राजा ने आग्रह किया की आप खुद बताये की आप को क्या चाहिए ! अतः ब्रह्ममण सोच में पड़ गया की वोह क्या मागे धीरे धीरे उसके अन्दर लालच का बिज उगने लगा और ब्रह्ममण ने कहा की मुछे कुछ समय चाहिए  बताने के लिए , इस पर राजा ने कहा ठीक है ! और राजा ने उसे समय दे दिया और राजा घुमने  चले गए ! अब ब्रह्ममण के मन में विचार आया की, मै एक याचक और वोह एक राजा क्यों न सारा राज-पाट माग लिया जाये जिससे फिर किसी से कुछ मागने की जरूरत नहीं पड़ेगी और लोग मेरे सामने याचक होगे राजा के वापस आकर पूछने पर उसने छट से कहा वह राज्य चाहता है!! राजा ने कहा प्रिय वर  अपने मुछे तो भारहीन कर दिया आप नहीं जानते की मै कितने दिनों से प्रतिच्छा में था की कब इससे मुक्त होऊ ! मै न सो पाता हु  न चैन से खा पाता हु  हर पल मुछे मेरी प्रजा की चिंता रहती है , हर पल मै अपने देश के शत्रुओ के बारे में सोचता  रहता हु न तो मुछे भगवान् भजन का समय मिलता है न उसके द्वारा बनाये इस संसार को देखने का , यह सब सुनकर ब्रह्मण की आखे खुल गई उसे राजा की महानता का अनुभव हुआ और स्वयं पर पछतावा एक राजा हो कर भी राजा को अपने राज्य पर कोई मोह नहीं था लेकिन वोह ब्रह्मण होते हुए भी मोह में फस गया जब राजा ने सारा राज्य ब्रह्मण को देने के लिए मंत्रियो से राज्य देने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पीछे मुड़े तब तक ब्रह्ममण जा चूका था ????

Thursday, 30 June 2011

सलाह बीरबल की


एक समय की बात है बीरबल दरबार नहीं गए हुई थे और वोह आज घर पर ही थे उसी दिन बादशाह अकबर ने नौकर को चुना लाने के लिए दरबार से भेजा !तभी बीरबल ने देखा की बादशाह का एक नौकर तेजी से कहीं दौड़ा जा रहा है। बीरबल ने पुकार लगाई, ‘‘अरे भाई ! कहां जा रहे हो तुम ? इतनी जल्दी में क्यों हो ?’’
नौकर ने उत्तर दिया, ‘‘बादशाह ने मुझे दो ढेरी चूना लाने को कहा है।
यह सुनकर बीरबल को कुछ संदेह हुआ। उसने पूछा, ‘‘बादशाह सलामत उस समय क्या कर रहे थे जब उन्होंने तुमसे कहा कि चूना लेकर आओ ?


‘‘दिन में बादशाह जब खाना खा चुके थे तो मैंने उन्हें पान पेश किया। उन्होंने पान मुंह में रखा ही था कि मुझे हुक्म दिया कि चूना लेकर आऊं।’’
बीरबल कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘तुम बिल्कुल मूर्ख हो। तुमने पान में चूना ज्यादा लगा दिया होगा, जिससे बादशाह के मुंह का जायका बिगड़ गया होगा। अब तुम्हें सजा देने का यह तरीका चुना है उन्होंने। अभी जो चूना लेने तुम जा रहे हो, कुछ देर बाद वही चूना तुमसे खाने को कहा जाएगा। जब इतना अधिक चूना तुम्हारे पेट में पहुंचेगा तो तुम जिंदा कहां बचोगे।’’


सुनकर वह नौकर भय से थरथर कांपने लगा। बोला, ‘‘या खुदा ! अब मैं क्या करूं ?’’
बीरबल बोला, ‘‘देखो, होश मत खोओ। जैसा मैं कहता हूं, वैसा ही करो। सुनो, मक्खन के साथ चूने का असर लगभग खत्म हो जाता है। बराबर मात्रा में चूने के साथ मक्खन मिला लेना। यानी जितना चूना उतना मक्खन। इसे जब तुम खाओगे तो तुम पर चूने का जरा भी असर न होगा। ऐसा ही मक्खन मिला चूना लेकर तुम्हें बादशाह के पास जाना है। समझ गए न।’’
फिर उस नौकर ने वैसा ही किया जैसा बीरबल ने कहा था। बीरबल का यह सोचना भी बिल्कुल ठीक निकला कि बादशाह उसे चूना खाने का हुक्म देंगे। बादशाह ने उस नौकर से कहा कि यह सारा चूना उसे खाना है। और थोड़ी ही देर बाद सारा चूना उस नौकर के पेट में था। चूना खाकर वह अपने घर चला गया।
अगले दिन जब वह नौकर नियत समय अपने काम पर पहुंचा तो अकबर को लगा कि दुनिया के सात अजूबों में से एक उनके सामने खड़ा है। उस नौकर को देख वह हैरान तो थे ही, साथ ही उन्हें गुस्सा भी आ रहा था कि इतना चूना खाने के बाद भी यह जिंदा कैसे बच गया। तब पसोपेश में पड़े बादशाह ने एक चूना व्यापारी को बुलवा भेजा और उससे बोले, ‘‘कल मैं एक आदमी को तुम्हारे सुपुर्द करूंगा, तुम उसे चूने की भट्ठी में झोंक देना।’’
चूना व्यापारी ने हामी भरी और वहां से चला गया।


तब बादशाह उस नौकर से बोले, ‘‘देखो, तुम कल इस चूना व्यापारी के पास जाना और मेरे लिए पांच ढेरी चूना लेकर आना।’’
अगले दिन, बादशाह के लिए चूना लाने व्यापारी के पास जाने से पहले वह नौकर बीरबल के पास गया और सारी घटना से उसको अवगत कराया।
बीरबल ने उसकी बात ध्यान से सुनी, फिर बोला, ‘‘तुम अभी चूना लेने न जाओ।’’
दरअसल, जब बादशाह व चूना व्यापारी के बीच बातचीत हो रही थी तो बीरबल भी वहां मौजूद था। वह भलीभांति समझ गया कि बादशाह कि क्या मंशा है।


बीरबल ने यह भी देख लिया था कि एक अन्य नौकर ने भी यह सारी बातचीत सुन ली है।
वह नौकर पहले नौकर के प्रति शत्रुता का भाव रखता था। बीरबल जानता था कि यह कुटिल नौकर निश्चित समय पर सारा तमाशा देखने जरूर पहुंचेगा।
यही कारण था कि बीरबल ने पहले नौकर को तुरंत वहां जाने से रोक दिया था।


जैसी आशा थी वैसा ही हुआ। दूसरा कुटिल नौकर ठीक उस समय पर चूना व्यापारी के पास पहुंच गया। जब पहले नौकर को वहां आना था। उस नौकर को देख चूना व्यापारी ने समझा कि यही वह नौकर है, जिसे चूने की भट्ठी में फेंक देने का उसे हुक्म दिया है बादशाह ने। चूना व्यापारी ने उस कुटिल नौकर को गुद्दी से पकड़ा और घसीटकर ले जाते हुए चूने की भट्ठी में फेंक दिया।


थोड़ी ही देर बाद पहला नौकर वहां पहुंचकर बोला कि पांच ढेरी चूना चाहिए।
बादशाह का आदेश मान चूना व्यापारी ने उस नौकर को चूना दे दिया।
चूना लेकर वह नौकर दरबार में वापस आया। उसे सही-सलामत लौटा देख बादशाह की हैरानी सभी सीमाएं तोड़ गई, वे बोले, ‘‘क्या तुम रास्ते में किसी से मिले थे ?’’
‘‘नहीं हुजूर !’’ वह नौकर बोला, ‘‘लेकिन जब मैं जा रहा था तो बीरबल ने मुझे बुलाया था और मैं उसके घर भी गया था।’’
बादशाह को सारा  माजरा समछ्ते देर न लगी बादशाह समझ गए कि यह माजरा क्या है। उन्होंने नौकर


से चूना एक ओर रख देने को कहा और खुद   मुस्कराने लगे
नोट- हमारी गलतियो  से हमें अवगत कराये 

Wednesday, 29 June 2011

मिल गए गुरु

एक समय की बात है कबीर दास एक अच्छे गुरु की तलाश कर रहे थे ! वह सोच रहे थे की किसको अपना गुरु बनाये उन्होंने कई विद्वानों के नाम पर विचार किया लेकिन उन्हें किसी में अपने गुरु दिखाई  नहीं दिए एक दिन उन्हें रामानंद जी के बारे में पता चला तो कबीरदास उनके बारे में पता लगाते हुए कबीरदास रामानंद जी के पास पहुचे , बोले प्रभु आप मुछे अपना शिष्य बना लीजिये ! आप ही जो मेरे गुरु बन सकते है
रामानंद जी ने जवाब दिया मै तुमको छोड़ कर किसी को भी अपना शिष्य बना सकता हु लेकिन तुमको नहीं बना सकता !  कबीर वहा से चले आये कबीर के दिमाग में एक विचार आया  सुबह चार बजे जब रामानंद गंगा स्नान के लिए जब सीढियो से उतरने लगे अचानक रामानंद का पैर कबीर के सिने में पड़  गया और वह राम राम करते पीछे की तरफ हट गए मौका पाकर कबीर ने तुरंत रामानंद जी का पैर पकड़  लिया बस गुरु जी मुछे राम नाम का दान मिल गया ! प्रभु आज से आप ही मेरे गुरु है ! रामानंद तुरंत कबीर की चालाकी समछ गए और मुस्काने  लगे उन्होंने कबीर को उठाया और अपना शिष्य स्वीकार कर लिया आगे यही कबीर सारी दुनिया में अपने दोहों के लिए विख्यात हुए और उन्होंने अपने गुरु का मान बढाया  ?
                              कुछ दोहे यहा प्रस्तुत है
                                        "  दोहे "
"गुरु बिन ज्ञान, भेयाद बिन चोरी ,
होई ता कुछ न कुछ , थोरी माँ थोरी !!
"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर 
पछि को छाया नहीं ,फल लगे अति दूर !!
"माला फेरत जुग भया  , फिरा न मन का फेर 
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर !!
"दुःख में सुमिरन सब करे , सुख में करे न कोए 
जो सुख में सुमिरन करे ,ता दुःख कहे का होए !!
"कहत कबीर सुनो भाई साधू ,एक दिन ऐसा आयेगा 
हंस चुनेगा दाना मोती ,कौवा दूध पि जायेगा !!
नोट - हमारी गलतियो से अवगत कराये

Tuesday, 28 June 2011

बिन माँ की बच्ची पर भाभी की प्रताड़ना



यह कहनी एक ऐसी बच्ची की है जिसकी माँ उसके पैदा होते ही गुजर  जाती है उस लड़की की ७ भाबिया " यानि की भाइयो की बीबी " उनके साथ रहती है जब उनके भाई घर पर होते है तब तक तो उसको कोई तकलीफ नहीं देता जैसे ही भाई काम से चले जाते है सारा काम उसके सर डाल दिया जाता है और उसको मार - २ कर काम कराया जाता है लकिन उसे सबसे ज्यादा उसकी बड़ी भाभी उसे प्रताड़ित करती है हद तो तब हो जाती है जब उससे संभव न होने वाले काम उसे दिए जाते है एक बार उसकी बड़ी बभी ने उससे कहा अगर तू आज चलनी "जिसमे आटा को चला जाता है " उसमे उससे पानी लेन को कहा गया उससे कहा गया अगर वो चलनी में पानी नहीं लाई तो उसे न ही खाना दिया जायेगा बल्कि उसे घर से निकाल दिया जायेगा और उसके हाथ में चलनी देकर उसे कुए के पास भेज दिया गया उसकी बड़ी भाभी थी वोह बहाना ढूड रही थी उसे निकालने का अब वोह छोटी सी बच्ची रोते हुए कुए पास पहुची और वोह वहा बैठ कर रोने  लगी थोड़ी देर बाद उस कुए में रहने वाली मकड़ी को उस बच्ची का रोना देखा नहीं गया और उसने कुए से बहार आकर उससे पूछ ही लिया की क्यों रो रही हो उस बच्ची ने रोते हुए जवाब दिया मुछे भाभी ने इस चलनी में पानी लाने को कहा है उस मकड़ी ने चिंता मत करो तुम चलनी को निचे रख दो मै इसमें जाल लगा देती हु और तुम इसमें पानी भर कर ले जाना उस बच्ची ने ऐसा ही किया और पानी भर कर ले गई इससे बड़ी भाभी का यह प्लान चकना चूर हो गया उसे निकालने वाला उसने दूसरा प्लान बनाया और फी उस लड़की को जंगल भेज दिया और कहा अगर आज साम तक लकड़ी का गठ्ठर साम तक घर नहीं लाई तो तुमे घर से निकाल दुगी लेकिन उसे गठ्ठर बाधने  के लिए कुछ नहीं दिया और कहा गठ्ठर को बिना बाधे घर लेकर आना और उसे भूखा ही घर से भेज दिया बेचारी वोह लड़की दिन भर लकडिया इकठ्ठा करती रही जब लकडिया हो गई तब वोह बैठ कर रोने लगी की बिना बाधे लकडिया घर कैसे ले जाऊ यह सब माजरा साप देख रहा था उस साप ने लड़की के पास आकर पूछा क्यों रो रही हो लड़की ने भाभी की कही सारी बात बता दी साप ने चिंता मत करो उसने कहा मै इस गठ्ठर से लिपट जाता हु और तुम लकडियो को ले जाना और तुम इस गठ्ठर को जहा पर पनारा हो वाही रख देना मै पनारे में घुस जाउगा और तुम्हारी भाभी कुछ नहीं कहेगी उसने ऐसा ही किया और वोह लकडिया घर ले आई भाभी सोच में पद गई यह भी प्लान फेल हो गया अब उसने ऐसा प्लान बनाया की वोह इस बार वोह घर से निकल ही जाये उसने धान की बोरी देते हुए कहा "धान यानि बिना छिला चावल " उसको अपने हाथो से शाम तक छिल कर लाये  और यह भी कहा की अगर एक भी दाना टुटा या कम हुआ तो उसे धक्के मार कर घर से निकाल देगी और उसे धान की बोरी पकड़ा दी अब लड़की छत पर जाकर बैठ कर रोने लगी एक चिड़िया को उस पर दया आ गई उसने उस लड़की से पूछा क्यों रो रही हो उसने भाभी का सारा ब्र्तान्त उसे सुना दिया उस चिड़िया ने कहा चिंता मत करो वोह चिड़िया जाकर अपनी सभी सहेलिओ को लिवा लाई उन सभी ने मिलकर शाम से पहले ही सारा धान को छिल दिया लेकिन उनमे एक कानी चिड़िया थी जिसने एक दाना चुप चाप खा लिया अब उस लड़की को क्या पता उसने सारा चावल बोरी में भरा और भी को दे दिया भाभी ने बड़े गौर से देखा और कुछ देर बाद कहती है इसमें एक दाना कम है वोह दाना कहा है उस लड़की ने जवाब दिया मुछे नहीं मालूम उसकी भाभी ने उसे उसी वक्त घर से निकाल दिया फिर वोह लड़की रोते हुई जंगल की तरफ चली गई और जंगल में बैठ कर रोने लगी उधर से उनके भाई कम से घर लौट रहे थे उन्होंने जंगल में किसी को रोते सुना तो उनके सबसे बड़े भाई ने कहा सायद कोई रो रहा है उन्होंने घोड़े को उसी तरफ मोड़ दिया जिधर से आवाज आ रही थी पास जाकर देखा तो वोह उनकी छोटी बहन निकली उसने सारा ब्र्तान्त अपने भाइयो को सुनाया उन्होंने उसे अपने साथ ले लिया और घर पर जाकर अपनी छोटी बहन का नाम पुकारते हुए कहा पानी लेकर आओ लेकिन पानी लेकर सबसे छोटी उस लड़की की भाभी निकली उन्होंने उससे पानी नहीं लिया उन्होंने कहा पानी तो हम केवल बहन के हाथो से पियेगे लेकिन बहन घर पर हो तब न धीरे - २ करके उसकी सभी भाभिया पानी लाई लेकिन पानी उन्होंने किसी के हाथ का नहीं पिया अब सबसे बड़ी वाली भाभी आई पानी लेकर जिसने उसे घर से निकला था अब उसके भाइयो ने उसे वाही रोक लिया और छोटी बहन को बुलाया जो उनके भाइयो के पास थी उसे बुलाया यह देख बड़ी भाभी के होस उड़ गए उस लड़की से पूछा  क्या इसी भाभी ने तुमको घर से निकाला था उस लड़की का जवाब हा में था भीर क्या था बड़े भाई ने अपनी तलवार निकाल कर उसी वक्त अपनी पत्नी का सर कलम कर दिया और सभी भाभियों को चेतावनी दी अगर किसी ने आज के बाद बहन को किसी तरह का कष्ट दिया तो उसका अंजाम यही होगा फिर किसी ने उसे कभी परेसान नहीं किया और सभी लोग हसी खुशी से रहने लगे 
इस लेख में कोई  गलती हो तो हमें अवगत कराये अपनी राय हमें दे 

Monday, 27 June 2011

बहादुर लड़की



बात उन दिनों की है जब मै इंटर की परीछा दे रहा था मै उन दिनों परीछा केंद्र से परीछा देकर ऑटो से वापस आ रहा था और मै ड्राईबर की बगल वाली सिट पर बैठा था अचानक एक लड़की ऑटो में आकर पीछे वाली सिट में बैड गई और उसके साथ ही जल्दवादी में एक लड़का ऑटो में चढ़ता   हुआ दिखाई दिया और वोह लड़की के बगल में बैठ गया हम कुछ ही दूर पहुचे थे की पीछे से जोरदार की एक तमाचे  की आवाज आई अचानक ऑटो में बैठे सभी लोग दंग रह गए लड़की बहुत गुस्से में थी और वोह जोर से लड़के से कह रही थी की आखिर तू पूछेगा नहीं की मैंने थप्पण क्यों मारा ? लड़के के मुह से आवाज नहीं निकल रही थी सायद वोह डर गया था वोह इसलिए सायद डर गया था की माहोल बिगड़ गया है अगर कुछ बोला तो उसकी धुनाई पक्की है लेकिन सारी सवारिया यह जानने के लिए उत्सुक  थी की आखिर  हुआ क्या  लेकिन ऑटो वाला ऑटो रोकने की बजाये चलाये जा रहा था ? सारी सवरिया अनजान बनकर पूछने लगी क्या हुआ ? मैंने सोचा की लड़की हिचकिचाएगी  और आज के इस लफंगे को सबक मिलने से रह जायेगा  पर वोह बहुत साहसी लड़की निकली , उसने ऑटो वाले से कहा अगर वोह उस लड़के को ऑटो से नहीं उतारेगी तो वोह खुद उतर कर दूसरा ऑटो ले लेगी  ! फिर उस लड़की ने सवारियो को बताया की वोह लड़का काफी दिनों से रोज ऑटो में आकर बैठ जाता था लकिन आज उसने गलत हरकत की तो मैंने भी सबक सिखाने  में देर नहीं की उसने कहा अगर मै ऐसा नहीं करती तो यह मुछे कमजोर और मजबूर समछ कर मुछे परेसान करता और इसकी हरकते बड़ जाती इस लिए मैंने ऐसा किया ! फिर क्या था सारी सवारिया एक साथ बोल उठी इसे तुरंत आटो से उतारते हो की हम सभी उतर जाये ? फिर क्या था ऑटो वाले को रोक कर उस लड़के को उतरना पड़ा  ? मै सारे रास्ते यही सोचता रहा की सभी लडकिया ऐसे ही साहस का परिचय दे तो सायद इस  छेड़ खानी  पर अपने आप ही विराम लग जाये?

Sunday, 26 June 2011

महाराज की न्यायशीलता



यह कहानी बुंदेलखंड में ओरछा नामक स्थान में एक न्यायप्रिय राजा ओरछा नरेश वीर जू देव जी की है वोह एक बीर योद्धा होने के साथ - २ न्याय प्रिय भी थे एक दिन उनका पुत्र शिकार  के लिए जंगल में गया सारा दिन जंगल में घुमने के बाद जब उसे कोई शिकार नहीं मिला अचानक उसकी नजर एक हिरन पर पड़ी राजकुमार अपने घोड़े  से हिरन का पीछा करने लगा लेकिन राजकुमार का संतुलन बिगड़ जाने से घोड़े की गति धीमी हो जाती है और हिरन नजरो से ओझल हो जाता है राजकुमार को कुछ दूर पर एक महात्मा दिखे राजकुमार महात्मा के पास जाकर पूछता है की "महात्मन " अपने किसी हिरन को जाते इधर से देखा है महात्मा ने कोई जवाब नहीं दिया ? राजकुमार आगे बढ जाते है लकिन उन्हें हिरन नहीं मिलता है जिससे राजकुमार क्रोधित होकर महात्मा के पास आता है और उन पर अपने कुत्तो को छोड़ देता है जिससे महात्मा की मृत्यु हो जाती है ?  यह बात साडी प्रजा में "जंगल में आग के सामान " फ़ैल जाती है अब महाराज दुबिधा में पड़ जाते है  की वोह अपने पुत्र  को सजा कैसे दे ? अब प्रजा भी सोच में पड़ जाती है की महाराज के न्यायशीलता की यह परीछा होगी महाराज कार्यवाही का आदेश दे देते है राजकुमार को अपराधी घोषित किया जाता है लेकिन कुछ दरबारी गढ राजा से उसे माफ करने का निवेदन करते है तब महाराज सिँहासन से उठ कर कहते है कि राजकुमार ने आवेश मे आकर यह गुनाह किया है इसलिए यह गुनाह माफ करने योग्य नही है आखिर वह राज्य ही कैसा होगा जहा महात्माओ को इस प्रकार मारा जाए इसलिए मै मानवता कि सुरझा के लिए राजकुमार को म्रत्यु दंड देता हुँ राजा कि इस न्यायशीलता को देख राजा के आगे समस्त प्रजा का सिर झुक गया

Friday, 24 June 2011

अन्धो की गणना

एक बार की बात है अकबर और बीरबल दरवार में थे तभी अकबर ने बीरबल से पूछा की हमारे देश में कितने अंधे लोग है मुछे अपने देश में अन्धो की जनसँख्या कितनी है यह तुम मुछे पता करके बताओ बीरबल ने कहा ठीक है महाराज मै आपको एक महीने के अन्दर गणना करके बता दुगा अकबर ने कहा ठीक है अब बीरबल वहा से चल दिया और दुसरे दिन से गणना करने में लग गए उन्होंने गणना करने का जो तरीका अपनाया वोह महाराज के समछ में नहीं आया उनका तरीका जो था वोह एक जगह पर बैठ कर गणना करने का था बीरबल ने एक रजिस्टर लिया और वोह बाजार में जाकर मोची का काम करने लगे उनको जो भी देखता वोह यही पूछता क्या कर रहे जो भी बीरबल से पूछता क्या कर रहे हो उसका नाम रजिस्टर में लिख लेते बीरबल अब एक महिना होने को था तभी महीने के आखिरी दिन महाराज वहा से गुजर रहे थे बीरबल को मोची का काम करते    देख  बीरबल से  पूछा  क्या कर रहे हो बीरबल बीरबल ने उनका भी नाम लिख लिया रजिस्टर में और महाराज के जवाब का कुछ उत्तर नहीं दिया अब बीरबल दरबार में पेस हुए अकबर ने पूछा अन्धो की जनगणना कर ली बीरबल ने कहा जी महाराज अकबर ने पूछा अन्धो की संख्या कितनी है बीरबल ने सर चहकते हुए कहा महाराज यहाँ सभी अंधे है महाराज ने पूछा वोह कैसे  बीरबल ने कहा देखिये  महाराज  मै बाजार में मोची का काम कर रहा  था मैंने  जिसको  भी देखा  उसने  मुछसे  यही पूछा की क्या कर रहे हो अगर  अंधे न  होते  तो  वोह मुछसे यह  प्रस्न  ही न करते महाराज ने बीरबल से कहा तुम्हारा भी    जवाब नहीं कैसे - २ काम करते हो  अब महाराज और बीरबल दोनों  हसने  लगे और अपने -२ रस्ते  चल दिए 

खुल रही सरकार की पोल

मै एक छात्र हु और मैंने इसी साल १२ वि पास किया है मै न तो कोई प्रोफेसनल राईटर हु और न कोई लेखक मै तो जो मेरा दिल कहता है वाही करता करता हु मै अपने दिल की बात शब्दों  के माद्यम से यहाँ उसको लिख रहा हु जो गलतिया समछ में आये मुछे अवगत कराये
                    "सरकार की पोल से मेरा मतलब "
 सरकार के वादे सारे छुड़े नजर  आते साफ़ -२ दिख रहे है  सरकार का लगता है सिद्धात ही बना लिया है की अनाज को खरीद कर उसको एक कुढ़े की ढेर की तरह फेक देना और उस आनाज को भूखे लोगो नहीं देना है चाहे वोह साद जाये या गल जाये अभी तजा हालिया रिपोर्ट देखि जाये तो भारत की ६.५ करोड़ जनसँख्या भूखो मर रही है सरकार को इससे क्या सरकार के गोदामों में अनाज सड़ जायेगा लकिन गरीबो क नहीं बाटा जायेगा ऐसी कसम खा रखी है सरकार ने क्योकि उनके बच्चो और उन्हों ने भूख से तडपना क्या होता है वोह महसूस नहीं किया है न इस लिए  कैसे समछे गे इस समय की अगर हकीकत में देखे तो ६.५ करोड़ नहीं इससे कही ज्यादा है लकिन कागज कलम का खेल है जिनके पास खाने को नहीं उनका apl  कार्ड  तक नहीं बनता और जिन्होंने कभी गरीबी देखि ही नहीं है उनके पास bpl  कार्ड है जिनको राशन मिलना चाहिए उनको आनाज के दर्सन नहीं होते है जिनके घरो में आनाज सड़ रहा है उनको रसन कार्ड में नाम और हर महीने रासन दिया जाता है हकीकत तो यह है की सरकार  गरीबो के  जो भी खेल - २ रही है इससे आने वाला हमारा भविष्य तो साफ़ - २ दिखाई दे रहा है की वोह ब्राईट नहीं बल्कि ब्लैक है उसके लिए हम सभी को दोसी भी नहीं ठहरा  सकते है क्योकि मैंने कही पढ़ा था 
           "शैले - २ न मानिक्यम , मौतिकम न गजे - २ !
                              साधवो न सर्वत्र , चन्दनं न बने -२,,
इस लिए सभी को गलत साबित नहीं कर सकते लकिन अगर किसी फल के बिच में सदा फल रख देने से वोह सरे फल साडा देता है उसी प्रकार एक गन्दा व्यक्ति पुरे सरकार की छवि ख़राब करता है उसी सड़े फल को सरकार को निकलने की जरुरत है 


Thursday, 23 June 2011

होसलो



सपने उन्ही के सच होते है
जिनके सपनो में जान होती  है 
पछियो के पारो में नहीं 
होसलो में उड़ान होती